टेक्नोलॉजी के 10 अटैक
बेशक टेक्नोलॉजी ने हमें बहुत कुछ दिया है। हमारी जिंदगी आसान बनाई है और हमारा बेशकीमती वक्त बचाया है। लेकिन, इसका दूसरा पहलू भी है।
टेक्नोलॉजी ही है, जिसकी वजह से हम अपनी तमाम नेचुरल खूबियां खोते जा रहे हैं।
आपकी जिंदगी से हमने ऐसे ही 10 पहलू निकाले हैं, जहां आप बेहद कमजोर हो चुके हैं।
आलसी हो गए हम
टेक्नोलॉजी ने कतारें छोटी कर दी हैं। अब आपको स्टेशन पर, बस स्टॉप पर या सिनेमा हॉल पर एक अदद टिकट के लिए जद्दोजहद नहीं करनी पड़ती।
यह सब टेक्नोलॉजी का ही कमाल है। लेकिन जरा सोचिए, क्या इसने आपको आलसी नहीं बना दिया। बिल हो, टिकट हो या फिर शॉपिंग, हर सुविधा एक क्लिक पर आपके दरवाजे पर मौजूद है।
आलम यह है कि अब इन सुविधाओं का मजा लेने के लिए आपको कंप्यूटर या लैपटॉप भी ऑन नहीं करना पड़ता, फोन पर ही ऐसी हजारों एप्लीकेशंस मौजूद हैं।
हैंडराइटिंग का कबाड़ा
आपको स्कूल-कॉलेज में 'सुलेख' लिखने वाले वो दिन तो याद ही होंगे। राइटिंग खराब होती थी तो मास्टरजी हमारी उंगलियों की कायदे से मरम्मत कर देते थे।
लेकिन, अब कीबोर्ड और फोन के कीपैड ने हमारी राइटिंग का कबाड़ा निकाल दिया है। दिलचस्प बात यह है कि आपकी प्रिय टेक्नोलॉजी ने टेक्स्ट मैसेज की लैंग्वेज तो सिखा दी, गूगल ने शॉर्टकट और स्माइली भी बनाने सिखा दिए, लेकिन आपकी शब्दों की मेमोरी जाती रही।
यही वजह है कि पिछले साल हुए एक सर्वे में पाया गया कि ऑटो करेक्ट जेनरेशन 'नेसेसरी' और 'सेपरेट' जैसे सामान्य शब्दों की स्पेलिंग भी सही नहीं लिख पाती है।
याद्दाश्त हो गई गुम
नोट्स और अलार्म कैलेंडर आपके फोन में समा चुके हैं। ईमेल फोन से जुड़ा हुआ है।
स्मार्ट कहा जाने वाला फोन खुदबखुद आपकी और आपके दोस्तों की जिंदगी से जुड़े अहम इवेंट्स को सोशल नेटवर्किंग साइट्स से सिंक करता है और तय समय पर आपको याद दिला देता है कि आपको आज किसी को बर्थडे विश करना है या फिर फलां दिन आपने पहली डेट की थी।
ऐसे लोगों का भी बड़ा तबका है जिसने जरूरी पासवर्ड तक याद करना छोड़ दिया है। ईमेल के ड्राफ्ट में पासवर्ड सेव रहते हैं और फोन हमेशा सीने से चिपका रहता है। किसी दिन बिना फोन ऑफिस पहुंच गए तो नंबरों के मोहताज हो जाते हैं।
पिछले दिनों हार्वर्ड, कोलंबिया और विस्किंसन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर्स ने भी एक शोध से खुलासा किया था कि टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से दिमाग और उसके याद करने की क्षमता पर भी गहरा असर पड़ता है।
निजी लाइफ की ऐसी की तैसी
हाल ही में हुए एक शोध में पता चला है कि आम तौर पर हम दिनभर में करीब 150 बार अपना फोन चेक करते हैं, जिसमें 18 बार टाइम देखने के लिए और 23 बार मैसेजिंग के लिए फोन देखते हैं।
इससे साफ जाहिर है कि टेक्नोलॉजी ने हमारी जिंदगी को कुछ इस कदर अपनी जद में ले लिया है, कि इससे निजात पाना न सही है और न ही संभव। फिर भी, सुबह की पहली चाय से लेकर नाइट वॉक तक शायद ही कोई ऐसा पल हो, जब फोन या लैपटॉप हमारे आस-पास मौजद नहीं होता।
यही वजह है कि दोस्त से लेकर पार्टनर तक, बीवी से लेकर बॉस तक सब अक्सर हम पर बिफर पड़ते हैं। फेसबुक और ट्विटर का प्रोफाइल ही हमारी जिंदगी बनकर रह गया है। मेट्रो से लेकर बस तक हर जगह एक सेकेंड का भी वक्त आप अपने साथ नहीं बिताते।
वक्त मिला नहीं कि झट से फेसबुक और ट्विटर ऑन हो जाता है। न नए दोस्त बनते हैं और न ही आप किसी हैंगआउट का मजा ले पाते हैं।
अटेंशन पाने की होड़
टेक्नोलॉजी के साथ यह बीमारी भी आती है। इसे आप 'एफबी अटेंशन सिंड्रोम' कह सकते हैं। लोगों के पास नई टेक्नोलॉजी आती नहीं कि वे हर वक्त, हर किसी से सिर्फ उसकी ही बात करते नजर आते हैं।
अटेंशन पाने की होड़ में वे इस कदर जुट जाते हैं कि उनके दिमाग में सिर्फ फेसबुक स्टेटस, फोटो और कमेंट का ही ख्याल बना रहता है। कुछ लोग तो अपनी जिंदगी के कुछ बेहद निजी पलों को भी फेसबुक और ट्विटर पर साझा कर देते हैं। शायद उन्हें अंदाजा भी नहीं होता कि लोग उनके बारे में क्या सोच रहे हैं।
ऐसे भी कुछ मामले सामने आ चुके हैं, जब कुछ लोगों ने फेसबुक पर ही आत्महत्या करने का ऐलान कर दिया।
डॉक्टरों की मानें तो लोग मानसिक तौर पर इतने कमजोर हो जाते हैं कि वे उसी को अपनी दुनिया समझने लगते हैं। और, जब लोग उनसे बात करना बंद करते हैं तो वे डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं।

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